Tuesday, 29 March 2011

‘सिगरेट’ रात भर उनके खोखले सीने में लगातार जलती है

11 APRIL 2010
♦ पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर











“मैं जब से 10 साल की थी तब से यह पीका पी रही हूं।” कान में पीका को खोंचकर रखनेवाली 70 साल की आदिवासी महिला चपाड़ी बुदेयी ने यह बात कही, जब हमने उनसे पूछा कि वह कब से धूम्रपान कर रही हैं। और अब यह वर्षों से उनकी आदत बन चुकी है। इसके बारे में उन्होंने आगे कहा, “पीका पीना अपने मां-बाप को पीते हुए देख कर ही सीखा और जब शादी के बाद ससुराल आयी तो देखा मेरे पति भी पीका पीते हैं। फिर हम दोनों मिलके पीने लगे।”

ओडिशा के कोरापुट जिले के पोटागीं ब्लाक के पोटापाडू गांव में चपाडी अकेली नहीं हैं जो पीका पीती हैं बल्कि उनकी उम्र की ज्यादातर महिलाएं और पुरुष पीका पीने के अभ्‍यस्‍त हैं।

60 साल की पामिया मंगाली को अब भी यह साफ तौर से याद है कि उन्होंने कैसे पीका पीने की शुरुआत की।

“मैं पीका पीने से पहले गुड़ाखू करती थी। (गुड़ाखू भी एक तरह का दंतमंजन है, जिसमें तंबाकू होता है, इसलिए इसे दांत साफ के लिए कम और एक तरह के नशा के लिए ज्यादा उपयोग किया जाता है।) लेकिन बाद में पीका पीना शुरू किया। जब मैं छोटी थी, तब जब मेरे मां-बाप मुझे पीका पीने नहीं देते थे। तब मैं तब तक जिद करके रोती थी, जब तक मुझे एक या आधा पीका नहीं मिल जाता था।”

जब उनसे पूछा कि वह पीका क्यों पीती हैं, तो उन्होंने जवाब कुछ इस तरह से दिया, “में अपना मुंह साफ रखने के लिए यह पीती हूं और साथ ही ठंड से बचाव के लिए भी”। पामिया दिन में पांच से ज्यादा बार पीका पीती हैं। जैसे गांव की ज्यादातर बुजुर्ग महिलाएं पीती हैं।

पीका या सुटा यानी तंबाकू के पत्ते को हाथ से मलकर बनाया गया 6 से 8 इंच का सिगरेट की तरह होता है जो सिगरेट से काफी ज्यादा मोटा और स्वाद में भी काफी कड़वा होता है। यह पीका, जिसे सुटा भी कहते हैं, ओडिशा के कोरापुट मलकानगिरी और आंध्रप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और पुरुष दोनों पीते नजर आते हैं।


महिलाएं अपने कान के ऊपर यह पीका रखती हैं। फिर चाहे वह घर में हों, खेत-खलिहानों में या बाजार में घूम रहीं हों, सुटा साथ में जरूर रखती हैं। और जब आपस में मित्र रिश्‍तेदारों से मिलतीं भी हैं, तो यह पीका पीकर बतियाते नजर आते हैं।

“मैं अगर यह पीका नहीं पीऊंगी तो मेरा खाना हजम नहीं होगा।” ऐसा 68 साल की पांगी कसाई कहतीं हैं।

“मैंने बहुत देर में पीका पीने की आदत अपनायी है। जब मेरे पति की मौत हो गयी, तब मैं बहुत अकेली हो गयी। तब मैं पीका पीकर समय गुजारने लगी और इससे मुझे काफी राहत मिली। इस तरह से इसकी मुझे लत हो गयी।”

गांव में आखिर क्यों ज्यादातर बुजुर्ग महिलाएं पीका पीती हैं? इसका जवाब देते हुए गांव के एक शिक्षित युवक बलराम पांगी ने समझाते हुए कहा कि “आजकल केवल बुजुर्ग महिलाएं पीका पीती हैं जबकि युवतियां गुड़ाखू घिसती हैं और इसके पीछे आर्थिक वजह है। गुड़ाखू महंगा है, जबकि पीका लोग खुद घर में बनाते हैं और बाजार में भी यह गुड़ाखू के मुकाबले सस्ता मिलता है। जब वह जवान होती हैं और काम करके पैसा कमा सकती हैं, तब तक गुड़ाखू घिसती हैं – पर जब वह बुजुर्ग हो जाती हैं और परिवार की जिम्मेदारियां कंधे पर आती है, तब वे गुड़ाखू छोड़कर पीका पीने लगती हैं। और बुजुर्ग होने के कारण उन्हें पीका पीने में शर्म भी महसूस नहीं होती।”

तो इस तरह से जो युवा हैं, वह गुड़ाखू करते हैं – वहीं बुजुर्ग पीका पीने के आदी हैं। यानि इन आदिवासी गांव में बच्चों को छोड़कर सभी किसी न किसी प्रकार से तंबाकू का सेवन करने के आदि हैं।

पर रुकिए!

क्या सचमुच बच्चे बिलकुल तंबाकू का सेवन नहीं करते हैं? नहीं, वह भी जाने-अनजाने तंबाकू का सेवन कर रहे हैं। वह प्रत्‍यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्‍यक्ष रूप से तंबाकू का सेवन कर रहे हैं जो उतना ही खतरनाक है जितना प्रत्‍यक्ष रूप से तंबाकू सेवन से होता है। जितने छोटे बच्चे होते हैं, वह उतने अपने मां बाप और दादा दादी के पास होते हैं या गोद में होते हैं। और जब बड़े धूम्रपान कर रहे होते हैं, तो अनायास ही ये मासूम बच्चे धूम्रपान से छोड़े गये धुआं का सेवन करते हैं। उसके अलावा अपने छोटे छोटे कमरे में धूम्रपान करने से उसके अंदर रह रहे सभी लोग छोड़े गये धुंए को सांस में लेने को मजबूर होते हैं।

10 साल के देब का कहना है कि उसकी मां पीका पीती हैं, उसका धुआं उसे अच्छा नहीं लगता। देब यह बात कम से कम बता पा रहा है, पर छोटे बच्चे यह बता भी नहीं पाते।

अप्रत्यक्ष धूम्रपान के दुष्प्रभाव के बारे में पिछले चार दशकों में हुए सैंकड़ों गहन और विस्तृत अध्ययनों के बाद यह साबित होचुका है कि अप्रत्यक्ष धूम्रपान कई गंभीर बीमारियों की वजह है, जिनमें हृदयरोग, फेफड़े का कैंसर, अस्थमा आदि शामिल है। हाल ही में हुए अध्ययनों से इन बातों के संकेत मिले हैं कि अप्रत्‍यक्ष धूम्रपान कई तरह की खतरनाक बीमारियों की वजह बन सकते हैं। इस तरह के पुख्ता अध्ययनों के निष्कर्षों के बाद अब विश्व स्वाथ्य संगठन ने नीति निर्देशावली जारी की है, जिसमें यह बताया गया है कि अप्रत्यक्ष धूम्रपान के कुप्रभावों से लोगों को कैसे बचाया जा सके।

और अब यह भी जान लें कि बच्चों के आसपास धूम्रपान से उन पर क्या असर होता है?

♦ शिशुओं में अचानक मौत के लक्षण (Sudden Infant death syndrome (SIDs)
♦ फेफड़े के कैंसर, कान में संक्रमण, गहरा अस्थमा, बच्चे के सर्वांगीण विकास में रोक, ब्रोंकैटिस और निमोनिया जैसी बीमारी होने की संभावना है।

अब देखते हैं, धूम्रपान का कुप्रभाव बड़ों पर क्या हो सकता है?

♦ फेफड़े का कैंसर, हृदय रोग, हृदघात का खतरा, स्‍थायी सांस की बीमारी, अस्थमा, छाती में दर्द हो तो उसका और बढ़ना, फेफड़े के काम में गिरावट, आंख और नाक में जलन, सर दर्द, गले में दर्द, चक्कर आना, अरुचि, कफ और श्वास प्रश्वास संबंधी बीमारी शामिल है।

और इसका गर्भ पर होनेवाले असर इस प्रकार के हैं :

♦ कम वजन के शिशु का पैदा होना और समय से पहले प्रसव, शिशु के कम समय में मौत होने का खतरा, मृत बच्चे का पैदा होना, गर्भ नष्ट का खतरा, जन्मजात असामान्यता, अचानक शिशु की मौत का लक्षण (SIDS), स्‍थायी कफ, जोर जोर से सांस लेना या हांफना, अस्थमा, कान की बीमारी, फेफड़े का काम प्रभावित होना आदि शामिल है।

जाहिर है इन सबका असर उन मासूम आदिवासियों पर और खासकर आदिवासी बच्चों पर पड़ता ही होगा, जिसके बुरे असर से न केवल वह बल्कि उनके मां बाप भी अनजान हैं। इसलिए इसका क्या असर हो रहा है, इसके गहन अध्ययन की जरूरत है। साथ ही लोगों में इसके दुष्प्रभाव के बारे में जागरूकता फैलाने की जरूरत है।

(एनडीटीवी इंडिया से लंबे समय तक जुड़े रहने के बाद पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं। साथ ही एनएफआई के फेलो भी हैं।)

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